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उघड़ रहे मानपुर के बुनकर


गूगल से ली गयी तस्वीर
नोटबंदी ने गया जिले के मानपुर के बुनकरों पर असर डाला है। बुनकरों का कारोबार करीब-करीब ठप हो चुका है, जबकि श्रमिकों की संख्या में इजाफा हो रहा है

मानपुर (गया) : बिहार का मैनचेस्टर कहे जाने वाली मानपुर की पटवा टोली में नोटबंदी के बाद सबकुछ सामान्य नहीं है। यहां काम करनेवाले बुनकरों से लेकर पावरलुम मालिकों तक को कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है।

गया जिले में फल्गु नदी के किनारे बसा है मानपुर। मानपुर के पटवा टोली के कमोबेश हर घर में पावरलुम और हैंडलुम चलता है जिसमें गमछा, लुंगी से लेकर रजाई, गद्दे और तकिये के खोल बनते हैं।

मानपुर को मिनी कानपुर भी कहा जाता है। यहीं एक पावरलुम में काम करने वाले 50 वर्षीय चमारी प्रसाद कहते हैं, ‘नोटबंदी के बाद से बड़ी परेशानी उठानी पड़ी है। मालिक ने 500 के पुराने नोट दिये थे जिसे पहले तो लाइन लगाकर खाते में डाला और बाद में फिर लाइन लगाकर रुपये निकालने पड़े। पुराने नोट नहीं लेता तो मुझे देर से मजदूरी मिलती, इसलिये पुराने नोट लेना मेरी मजबूरी थी।’ चमारी प्रसाद पिछले 30 वर्षों में यह काम कर रहे हैं। नोटबंदी का एक महीना गुजर गया है लेकिन मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। चूंकि छोटे नोटों की किल्लत है इसलिए 2000 के नोट दिये जा रहे हैं। इतने बड़े नोट को भुनाना भी उनके लिए टेढ़ी खीर है। 

पावरलुम में लाल धागा पिरोते हुए चमारी प्रसाद कहते हैं, ‘दो हजार के नोट में भी दिक्कत है लेकिन क्या करूं, और कोई उपाय भी तो नहीं है।’ चमारी प्रसाद ने कहा कि नोटबंदी के बाद कुछ दिन तक पावरलुम बंद था क्योंकि सूते की सप्लाई नहीं हुई थी।

पावरलुम चलाते हुए धागे से निकलने वाला रोआं चमारी प्रसाद के शरीर में घुस जाता है जिससे कई बार बीमार भी पड़ जाते हैं। उन्होंने कहा, ‘काम खत्म करने के बाद गुड़ खाते हैं लेकिन ठंड में बड़ी दिक्कत होती है। कई बार बीमार पड़ जाता हूं तो डॉक्टर से दिखाना पड़ता है लेकिन रोजी-रोटी तो यहीं से मिलेगा इसलिए नौकरी करना मजबूरी है।’

पटवा टोली के एक पावरलुम में बने कपड़े को तह करने वाले 32 वर्षीय श्रमिक हल्धरी प्रसाद कहते हैं, ‘हमें भी पुराने नोट ही दिये गये थे जिन्हें अकाउंट में रखना पड़ा और फिर लाइन लगाकर निकालना पड़ा। दिक्कत अब भी है लेकिन कोई समाधान भी तो नहीं।’ 

एक पावरलुम में एक घंटे में 90 इंच लंबा और 76 इंच चौड़ा कपड़ा बनता है। एक कपड़े को तह करने के एवज में हल्धरी प्रसाद को 75 पैसे मिलते हैं।  
मानपुर में तीन पीढ़ियों से हैंडलुम चल रहे हैं। पहले ज्यादातर हैंडलुम थे लेकिन अब उनकी जगह पवरलुम ने ली है। वर्ष 1957 के बाद पावरलुम का चलन बढ़ा। संप्रति यहां लगभग 7500 लुम (करघा) चलते हैं जिसमें 20 हजार कारीगर काम करते हैं। 7500 में से महज 20 से 25 हाथकरघा होंगे। बताया जाता है कि पावरलुम, हैंडलुम से 10 गुना रफ्तार से चलता है जिस कारण उत्पादन अधिक होता है, यही वजह है कि लोग हैंडलुम की जगह पावरलुम को तरजीह देने लगे।

बिहार में सबसे ज्यादा करघा यहीं चलते हैं। मानपुर के अलावा भागलपुर, बिहारशरीफ, सीवान और पटना में भी पावरलुम चलते हैं। मानपुर की वस्त्र उद्योग बुनकर समिति के सचिव जीतेश कुमार पटवा कहते हैं, ‘नोटबंदी के कारण कारीगरों को तो रुपये देने में दिक्कतें आ ही रही हैं साथ इस कारोबार को भी मंदी की मार झेलनी पड़ रही है। रुपये निकालने और जमा करने की सीमा निर्धारित कर दिये जाने व बाजार में नोटों की कमी के कारण धंधे पर बुरा असर पड़ा है।’ यहां उत्पादित माल का 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम बंगाल में जाता है। जीतेश पटवा बताते हैं, ‘बंगाल के कारोबारी नोटों की किल्लत का हवाला देकर माल खरीद नहीं रहे हैं जिस कारण कई पावरलुम बंदी की कगार पर पहुंच गये हैं। पश्चिम बंगाल के अलावा असम, ओडिशा और झारखंड में भी माल की सप्लाई की जाती है लेकिन इन राज्यों में बहुत कम मांग है।’ उन्होंने कहा, ‘पहले जो व्यापारी हमसे माल खरीदते थे वे अब कह रहे हैं बाजार ठंडा पड़ गया है जिस कारण वे माल खरीद नहीं पा रहे हैं।’

मानपुर पटवा टोली में काम करनेवाले कारीगरों ने कहा कि नोटबंदी के बाद कई दिनों तक पारिश्रमिक के तौर पर पुराने नोट ही दिये जाते थे। चूंकि दैनिक मजदूरी पर ही इनका घर चलता था इसलिए पुराने नोट लेना इनकी मजबूरी थी।

मानपुर का वस्त्र उद्योग तो पहले से ही संकट से गुजर रहा था, इस पर नोटबंदी एक अलग सकट है। यहां पावरलुम चलाने वालों का कहना है कि भारत के दूसरे हिस्से में जो पावरलुम चलते हैं वे अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हैं जिस कारण वे फूल-फल रहे हैं लेकिन मानपुर पटवा टोली में आधुनिकता की बयार नहीं चली है। जीतेश कुमार पटवा ने कहा, ‘राजस्थान के टीकमगढ़, उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर और दक्षिण भारतीय राज्यों में चल रहे पावरलुम अत्याधुनिक तकनीक से लैस है लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है।’ यहां बनने वाला लाल रंग का गमछा आदिवासियों में काफी लोकप्रिय है इसलिए बंगाल, ओडिशा और असम के आदिवासियों में इसकी खूब डिमांड रहती है। पावरलुम मालिकों की मानें तो ऐसा गमछा दूसरी जगहों पर नहीं बनता है। 

गौरतलब है कि पावरलुम के लिए कच्चा माल यानी रंग-बिरंगे मोटे धागे पश्चिम बंगाल, पंजाब और दक्षिण भारतीय राज्यों से आते हैं। पहले रोज 2-3 ट्रक कच्चा माल मानपुर में उतरता था लेकिन अब इसमें कमी आ गयी है।

नोटबंदी का एक असर यह भी हुआ है कि इन दिनों कारीगरों की संख्या यहां बढ़ गयी है। असल में नोटबंदी के कारण पंजाब, मेरठ आदि मंडियों में भी मंदी है जिस कारण यहां से गये बुनकर वापस लौट आये हैं।  

पूरे भारत में बुनकरो की संख्या की बात करें तो लगभग 9 करोड़ लोगों का दानापानी इस पर निर्भर है। यहां के हथकरघे से बने सामान का निर्यात अमेरिका तक में होता है। एक अनुमान के मुताबिक, अमेरिका में हर साल 13.5 बिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया जाता है। अनुमान यह भी है कि वस्त्र उद्योग अकेला उद्योग है जिससे सबसे अधिक विदेशी मुद्रा मिलता है। इन सबके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर बुनकर बदहाल हैं। 

दो वर्ष पहले नरेंद्र मोदी जब बनारस चुनाव प्रचार करने गये थे तो उन्होंने बुनकरों की स्थिति में सुधार लाने का वादा किया था लेकिन अब तक उनकी स्थिति जस की तस बनी हुई है।

नोटबंदी के चलते उपजे संकट से पार पाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से कई तरह के कदम उठाये गये। शादी-व्याह करने वालों के लिए कई तरह की रियायतें दी गयीं। किसानों के लिए भी कई घोषणाएँ हुईं लेकिन पावरलुम सेक्टर के लिए किसी तरह की कोई घोषणा नहीं की गयी।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी नोटबंदी को जायजा ठहराया लेकिन इससे बुनकरों को उनके हाल पर छोड़ दिया। जीतेश कुमार पटवा ने कहा, ‘सरकार की तरफ से हमें किसी तरह का कोई सहयोग नहीं मिला है। हमने बुनकरों की समस्याओं को कई बार उठाया लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली।’ 

यहां यह भी बता दें कि मानपुर पटवा टोली की पहचान केवल पावरलुम के चलते नहीं है। आईआईटी और ऐतिहासिकता के लिए भी मानपुर जाना जाता है। मानपुर पटवा टोली भारत का एकमात्र क्षेत्र है जहां से एकमुश्त सबसे अधिक आईआईटीयंस निकलते हैं। वर्ष 1996 से 2011 तक मानपुर पटवा टोली ने 58 आईआईटीयंस दिये। बताया जाता है कि यहां के लगभग 200 घरों में कम से कम एक इंजीनियर है। 

इन सबके बावजूद यह सच है कि बुनकरों की हालत आज बेहद खराब है जिस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। वरना वह दिन दूर नहीं जब बच्चे इतिहास में ही पढ़ा करेंगे कि भारत में हथकरघे भी कभी चला करते थे। 
(शुक्रवार मैगजीन, दिसंबर 2016)

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