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टॉम न होते, तो अंग्रेज के किरदार को तरस जाता बॉलीवुड




मशहूर अभिनेता टॉम ऑल्टर का 29 सितंबर को निधन हो गया। वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। शुक्रवार को मुंबई में अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली।

22 जून 1950 को मसूरी (उत्तराखंड) में एक अमेरिकी परिवार में जन्मे टॉम ऑल्टर के 67 साल के जीवन का सिंहावलोकन करें, तो उनकी जिंदगी नाटकीयता से भरी हुई थी।

उनका जन्म एक पादरी परिवार में हुआ था। उनके दादा पादरी थे। उनके पिता पादरी थे। उनके चाचा पादरी थे, लेकिन उन्होंने पादरी बनने की जगह सिनेमा को चुना। उन्हें क्रिकेट से जुनून की हद तक मुहब्बत थी, लेकिन एक्टिंग में करियर बनाया।

उनके दादा मिशनरी से जुडे हुए थे और मूलतः अमेरिका को ओहियो के रहनेवाले थे। नवंबर 1916 में मिशनरी के काम से वह अमेरिका से सियालकोट आये थे। सियालकोट में ही टॉम ऑल्टर के पिता का जन्म हुआ। देश जब तकसीम हुआ, तो उनके परिवार का भी बंटवारा हुआ। टॉम के दादा-दादी पाकिस्तान चले गये और पिता भारत आ गये।

टॉम ऑल्टर ने पढाई के बाद कुछ दिनों तक अध्यापन किया और क्रिकेट भी सिखाया। यही नहीं, उन्होंने पत्रकारिता भी की। करियर के लिहाज से राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की फिल्म अराधना टॉम ऑल्टर के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। 1969 में इसी फिल्म को देखकर उन्होंने एक्टिंग की तरफ मुड़ने का फैसला ले लिया, यह सोचे बिना कि उनकी कदकाठी अंग्रेज जैसी है और बॉलीवुड में मुख्यधारा का किरदार नहीं मिलनेवाला।

उन्होंने सन् 1972 में पुणे स्थित फिल्म व टेलीविजन इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लिया। दो साल का एक्टिंग कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने बॉलीवुड का रुख किया। उन्हें पहली फिल्म मिली-चरस। इस फिल्म में उन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाई। इसके बाद उन्हें एक के बाद एक फिल्में मिलती गयीं, लेकिन अफसोस की बात है कि उन्हें अधिकांश किरदार अंग्रेज का ही मिला है। बॉलीवुड की फिल्म में अगर किसी सख्त गोरा अफसर का चरित्र होता, तो टॉम ऑल्टर को ही याद किया जाता। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि अगर टॉम ऑल्टर न होते, तो फिल्मों में अंग्रेज के किरदार के लिए बॉलीवुड को हॉलीवुड की ओर रुख करना पड़ता।

टॉम ऑल्टर को भारतीय का किरदार निभाने का मौका भी मिला, लेकिन गिनी-चुनी फिल्मों में ही। राम तेरी गंगा मैली ऐसी ही फिल्म थी। इस फिल्म में उन्होंने नायिका के भाई का किरदार निभाया था। एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि फिल्म रिलीज होने के बाद वह गुजरात गये थे, तो ट्रेन से उतरते ही कई महिलाएं उनके पैर छूने चली आयीं क्योंकि राम तेरी गंगा मैली फिल्म में उन्होंने गंगा (फिल्म की नायिका मंदाकिनी) की इज्जत बचायी थी।

यह उनकी कदकाठी रंग ही था कि मौलाना आजाद का किरदार निभाते हुए शूटिंग की टीम के एक सदस्य ने कह दिया कि उन्हें नहीं पता मौलाना आजाद इतने फेयर (गोरे) थे। इसपर उन्होंने जवाब दिया था – मौलाना आजाद का मिजाज बहुत फेयर था।

थियेटर में गालिब से टैगोर तक का रोल किया

बॉलीवुड में उन्हें टाइपकास्ट कर दिया गया था, लेकिन थियेटर ने उनकी एक्टिंग की भूख मिटायी। थियेटर में उन्होंने मिर्जा गालिब, मौलाना अबुल कलाम आजाद, महात्मा गांधी, साहिर लुधियानवी, रवींद्र नाथ टैगोर समेत कई बडी हस्तियों का किरदार बखूबी निभाया। सन् 1977 में उन्होंने नसीरुद्दीन शाह और बेंजामिन गिलानी के साथ मिलकर मोटले प्रोडक्शंस नाम का थियेटर ग्रुप तैयार किया था।

मौजूदा हालात से व्यथित थे टॉम

टॉम ऑल्टर मौजूदा हालात से बेहद चिंतित थे और राज्यसभा के साथ इंटरव्यू में यह जाहिर किया था। उन्होंने कहा था, ‘मेरे मानना है कि सरकार किसी की भी हो, वो तो ठीक है। लेकिन, एक जिंदगी है, जिससे सरकार का कोई ताल्लुक ही नहीं है। उसके बारे में हमें सोचना है। अब मोदी जी पीएम हैं। पहले मनमोहन जी थे। वो सब अपनी जगह ठीक है। लेकिन ये जो गुफ्तगू चल रहा है, वह कांग्रेस के जमाने में थी और भाजपा के जमाने में भी चल रही है। हम बिना वजह सरकार में उलझ जाते हैं।

‘नेहरू व गांधी की बुराई अफसोसनाक’

पंडित जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी के बारे में फैलायी जा रही तमाम तरह की अफवाहों को लेकर उन्होंने उक्त इंटरव्यू में अफसोस जताया था। उन्होंने कहा था, ‘जब मैं पैदा हुआ था, तो जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। उन्होंने कुछ गलतियां भी की होंगी, लेकिन 17 सालों तक उन्होंने देश को बांधे रखा। नई पीढी उनके बारे में कुछ भी नहीं जानती है, लेकिन वो उनकी बुराई करती है, तो बहुत अफसोस होता है। गांधी जी के बारे में भी गलत-गलत बातें कही जाती हैं, जो ठीक नहीं है।

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