Advertisement

Breaking News
recent

'गोल्डन फाइबर' का उड़ता रंग

गूगल से साभार

17वीं शताब्दी में पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग का सूत्रपात हुआ था और धीरे-धीरे यहां काफी संख्या में जूट मिलें खुल गयी थीं। सन् 1850 के बाद इस उद्योग का व्यापक विस्तार हुआ था। बंगाल से जूट का निर्यात यूरोप तक होने लगा था। उस दौर में जूट मिलों में काम करना शान की बात होती थी। लगभग 100 वर्षों तक जूट उद्योग खूब फूला-फला लेकिन इसके बाद इसके दुर्दिन शुरू हो गये। बताया जाता है कि 60 के दशक के बाद जूट उद्योग की हालत खराब होने लगी। जूट मिलों में लॉक आउट और कार्यस्थगन की नोटिस आम बात हो गयी थी। कई जूट मिलें बंद स्थायी तौर पर बंद हो गयीं तो कुछेक में हर वर्ष 3 से 4 महीने के लिए तालाबंदी होने लगी। जूट उद्योग तालाबंदी से दो-चार हो ही रहा था कि अब नोटबंदी से ‘गोल्डन फाइबर’ कही जाने वाली जूट का रंग उड़ाने लगा है।

नोटबंदी के कारण श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान करने में परेशानी हो रही है। हुगली जिले की गोंदलपाड़ा जूट मिल के श्रमिकों को हर महीने की सात और 22 तारीख को पेमेंट होता है। सात तारीख का पेमेंट तो ठीकठाक हो गया, लेकिन 400 से अधिक श्रमिकों को 22 तारीख का पेमेंट नहीं मिल सका। दैनिक मजदूरी पर जीनेवाले ये श्रमिक गुस्से में हैं और इसके लिए प्रबंधन के साथ ही श्रमिक यूनियनों पर भी दबाव बना रहे हैं। उत्तर 24 परगना जिले में स्थित रिलायंस जूट मिल में भी पेमेंट को लेकर श्रमिकों और प्रबंधन के बीच बहस हो गयी थी और इसके बाद जूट मिल में कार्यस्थगन की नोटिस लगा दी गयी। हालांकि कार्यस्थगन की नोटिस के पीछे नोटबंदी नहीं बल्कि प्रबंधन द्वारा अधिक उत्पादन के लिए दबाव वजह बतायी जा रही है, जिसका श्रमिकों ने विरोध किया था।

पश्चिम बंगाल में फिलहाल 50 से अधिक जूट मिलें चल रही हैं और कमोबेश हर जूट मिल में नोटबंदी को लेकर समस्या है। 

जूट मिल में काम करने वाले लगभग 2.5 लाख स्थायी और अस्थायी श्रमिक हर सुबह जब फैक्ट्री के गेट पर पहुंचते हैं, तो सबसे पहले उनकी नजर मिल के नोटिस बोर्ड पर जाती है कि कहीं कार्यस्थगन की नोटिस तो नहीं लग गयी। हर वर्ष राज्य का कोई न कोई जूट मिल तीन से छह महीने के लिए बंद हो जाती है और श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं। इस तरह की अनिश्चितताओं के बीच नोटबंदी उनके लिए एक नयी मुसीबत है। जिन मजदूरों का बैंक अकाउंट है उन्हें तो मजदूरी मिल जाती है लेकिन जिन्हें नकदी मिलती है उनके लिए बड़ी समस्या है। जूट मिल श्रमिकों का कहना है कि जूट मिल प्रबंधन खोटा करार दिये गये 500 या 1000 के नोट देना चाहता है।

गोंदलपाड़ा जूट मिल में 23 साल से काम कर रहे संजीव प्रसाद कहते हैं, ‘कई श्रमिकों की मजदूरी अब तक नहीं मिली है। वे गुस्से में हैं जिसके चलते जूट मिल में तनाव की स्थिति बनी हुई है। प्रबंधन सीधे कह रहा है कि अगर पेमेंट लेना है तो पुराने नोटों में लो या फिर बैंक में खाता खुलवाओ।’

कुछ जूट मिलों में हर महीने 10 से 12 तारीख के बीच और इसके बाद 25 से 27 तारीख के बीच श्रमिकों को मजदूरी दी जाती है। इन जूट मिलों में 10-12 तारीख का पेमेंट भी नहीं मिल पाया है।

वहीं, कुछेक जूट मिलों में 8 तारीख और फिर 22 तारीख को पेमेंट मिलती है। ऐसी जूट मिलों में 8 तारीख का भुगतान तो हो गया, लेकिन 22 तारीख का भुगतान अब तक नहीं हुआ है।

भाजपा की श्रमिक इकाई भारतीय मजदूर संघ की राज्य कमेटी के सदस्य शिवनाथ महतो भी मानते हैं कि नोटबंदी से असर तो पड़ा है लेकिन साथ ही वे यह भी कहते हैं कि यह फायदेमंद भी है। महतो ने कहा,  ‘जिनका अकाउंट नहीं है और नकद भुगतान होता है उनके लिए नोटबंदी समस्या है लेकिन इससे फायदा भी मिलेगा। खाता खुलेगा तो सरकार को पता चल पायेगा कि श्रमिकों को कितनी मजदूरी मिलती है और इनकी संख्या कितनी है।’

उल्लेखनीय है कि 8 नवंबर की शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संदेश में 500 और 1000 रुपये के नोट को रद्दी करार दिया था। इस घोषणा के बाद से ही विभिन्न जूट मिलों में मजदूरी को लेकर श्रमिकों और प्रबंधन के बीच तकरार शुरू हो गया था। हालात इतना संगीन हो गया था कि पश्चिम बंगाल के श्रममंत्री मलय घटक को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। गत 15 नवंबर को विभिन्न श्रमिक संगठनों और जूट मिल प्रबंधन के साथ मलय घटक ने बैठक की थी। बैठक में फैसला लिया गया था कि श्रमिकों का भुगतान किसी भी सूरत में नहीं रोका जायेगा। 

तृणमूल कांग्रेस की श्रमिक यूनियन आईएनटीटीयूसी के नेशनल फेडरेशन (जूट) के महासचिव तरुण चक्रवर्ती ने कहा, ‘हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि जूट मिल श्रमिकों का भुगतान न रुके और इसके लिए श्रम मंत्री और जूट मिल मालिकों के साथ नियमित संपर्क कर रहे हैं।’

वाममोर्चा सरकार में श्रम मंत्री रहे अनादि साहू कहते हैं, ‘जूट मिल प्रबंधकों से कहा गया था कि जिन जूट श्रमिकों का बैंक अकाउंट नहीं है, उनका अकाउंट खुलवाकर खाते में भुगतान किया जाए ताकि उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो लेकिन परेशानी तो है।’

वैसे, बैंक अकाउंट खुल जाने से जूट मिलों के स्थायी श्रमिकों का भुगतान तो समय पर हो जायेगा लेकिन पैसे निकालने के लिए उन्हें हर हफ्ते एक-दो दिन बर्बाद कर बैंकों और एटीएम में लाइन में लगाना होगा। अनादि साहू कहते हैं, ‘इससे उत्पादन प्रभावित तो होगा साथ ही श्रमिकों की आय में भी कमी आयेगी क्योंकि उन्हें हर महीने औसतन 5-6 दिन रुपये निकालने के लिए बर्बाद करने होंगे।’

गौरतलब हो कि स्थायी और ठेका श्रमिकों के अलावा ऐसे श्रमिकों की संख्या भी ज्यादा है जो दैनिक मजदूरी पर अलग-अलग जूट मिलों में काम करते हैं, उनके लिये नकदी की समस्या जस की तस रहेगी। ये श्रमिक दिनभर काम करते हैं शाम को नकद भुगतान लेकर घर लौटते हैं। 

पश्चिम बंगाल में हर दो-तीन महीने पर एक जूट मिल कुछ महीनों के लिए बंद हो जाती है। ऐसे में बेरोजगार श्रमिक उन जूट मिलों में काम करने चले जाते हैं जिन जूट मिल मालिकों को अधिक उत्पादन की जरूरत पड़ती है। वहां दैनिक मजदूरी पर वे काम करते हैं। दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले इन श्रमिकों के खाते में रोज रुपये भेजना संभव और व्यवहारिक नहीं होगा।

जूट मिलों से जुड़े श्रमिक बताते हैं कि मिल के बंद होने पर बेरोजगार होने वाले श्रमिकों को जरूरतमंद जूट मिलों तक पहुंचाने के लिए इन जूट मिलों में दलाल भी सक्रिय हैं। जूट मिलों से जुड़े सूत्र बताते हैं कि हर जूट मिल में 5 से 10 दलाल सक्रिय हैं जो जरूरतमंद जूट मिलों को श्रमिक देते हैं। इसके एवज में जूट मिल प्रबंधन से 5 से 10 रुपये प्रति श्रमिक के हिसाब से लेते हैं। सूत्र बताते हैं कि इन दलालों की नजर बंद होने वाले जूट मिलों पर टिकी रहती है। जैसे इन्हें पता चलता है कि कोई जूट मिल बंद हुआ है तो वे तुरंत श्रमिकों के पास पहुंचकर दूसरी जूट मिल में काम दिलाने की पेशकश करते हैं। दिहारी श्रमिकों की तरह ही जूट के लिए कच्चे माल की सप्लाई करने वाले किसान, किसानों से कच्चा जूट खरीदकर देने वाले ट्रेडर्स, ट्रेडर्स से जूट की गांठ खरीदने वाले बेलर्स, जूट मिलों में उत्पादन के बाद माल को इंडस्ट्री तक पहुंचाने वाले लोगों की भी समस्या का कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में 577 हेक्टेयर भूमि पर पाट का उत्पादन होता है जिससे लगभग 20 लाख किसान जुड़े हुए हैं। कच्चा पाट बेचकर ही इन किसानों के घरों के चूल्हे से धुआं उठता है। किसान खेतों में पाट उगाते हैं और उन्हें मुकाम स्तर पर जूट ट्रेडरों को बेचते हैं। जूट ट्रेडर्स से जूट मिलें कच्चा माल खरीदती हैं। इसी तरह जूट मिलों से उत्पादित माल ट्रेडर्स दुकानदारों तक पहुंचाते हैं। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2014-2015 में पश्चिम बंगाल में 89 लाख 69 हजार जूट बेल (गांठ) का उत्पादन किया गया था जिसमें वर्ष 2015-2016 में लगभग 9 लाख बेल (गांठ) की गिरावट आयी है। पश्चिम बंगाल के अलावा असम, मेघालय, बिहार, ओडिशा, आंध्रप्रदेश और त्रिपुरा में भी जूट उत्पादन होता है लेकिन पश्चिम बंगाल में जूट का उत्पादन सबसे अधिक होता है।

इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन के जेजीटी मार्केटिंग हेड सौरभ गांगुली बताते हैं, ‘नोटबंदी से जूट उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है। यहां श्रमिकों को मजदूरी देने से लेकर किसानों से माल खरीदने तक में नकदी का लेनदेन होता है। जिन जूट मिलों के श्रमिकों के बैंक अकाउंट हैं उन जूट मिलों में उत्पादन तो ठीकठाक होता है लेकिन बाकी जूट मिलों में शिफ्ट कम कर दिया गया है।’ वे आगे कहते हैं, ‘श्रमिकों के बैंक अकाउंट होने से उनके भुगतान समस्या तो खत्म हो जायेगी लेकिन जूट उद्योग केवल उत्पादन से जुड़े श्रमिकों तक सीमित नहीं है। कच्चा माल खरीदने से लेकर तैयार माल की डेलिवरी तक नकदी में लेनदेन होता है।’

किसानों से जूट के लिए माल खरीदने में आ रही दिक्कतों को देखते हुए जूट मिल मालिकों ने जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से अपील की है कि किसानों से कच्चा माल वह खरीद ले और उससे जूट मिल मालिक माल खरीदेंगे।

जूट मिल मालिकों की यह अपील कितनी कारगर साबित होगी इसमें संदेह है क्योंकि इसके लिए जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को 400 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। संजय गांगुली ने कहा, ‘इस प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने के लिए जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को 400 करोड़ रुपये की दरकार है, टेक्सटाइल मंत्रालय इतनी बड़ी रकम देने को तैयार होगा या नहीं पता नहीं।’

इंडियन बेलर्स एसोसिएशन की 21 सदस्यीय कमेटी के सदस्य जय कुमार बागला भी मानते हैं कि नोटबंदी से जूट उद्योग को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। बेलर्स जूट ट्रेडरों से कच्चा माल खरीद कर जूट मिलों को सप्लाई करते हैं। जय कुमार बागला कहते हैं, ‘हमलोग चेक देते हैं लेकिन ट्रेडर्स चेक लेना नहीं चाहते हैं क्योंकि चेक को भुनाने में दस तरह की दिक्कतें हो रही हैं।’ उन्होंने कहा, ‘हमलोग ट्रेडरों को चेक लेने या अकाउंट खोलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं ताकि जूट कारोबार पर असर न पड़े।’

इधर, इंडियन जूट मिल एसोसिएशन और नेशनल जूट बोर्ड के साथ मिल कर केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्रालय जूट मिल श्रमिकों के लिए वर्कशॉप आयोजित कर रहा है। इस वर्कशॉप में श्रमिकों को कैशलेस लेनदेन के बारे में सिखाया जा रहा है। जानकार बताते हैं कि जूट मिलों में काम करने वाले 90 फीसदी श्रमिक न के बराबर पढ़े-लिखे हैं, ऐसे श्रमिकों को कैशलेन लेनदेन की बारीकियां समझाना टेढ़ी खीर से कम नहीं होगा।

बहरहाल, जूट मिलों में काम करने वाले 2.5 लाख श्रमिक और जूट उद्योग से जुड़े 40 लाख किसान परिवार अच्छा खासा वोट बैंक भी है। राजनीतिक पार्टियां जब इनकी हिमायत करती हैं तो इनके जेहन में चुनाव भी होता है। यही वजह है कि सभी पार्टियां अपने स्तर पर इनका कल्याण करने में लगी हुई हैं। तृणमूल कांग्रेस सरकार के श्रम मंत्री खुद बैठकें कर श्रमिकों की समस्याओं का समाधान करने की कोशिश कर रहे हैं। वाममोर्चा सरकार में मंत्री रहे अनादि साहू भी मैदान में उतर कर श्रमिकों के हित की बात कर रहे हैं जबकि भाजपा की श्रमिक इकाई भारतीय मजदूर संघ के नेता श्रमिकों को यह समझाने में लगे हैं कि केंद्र सरकार के बंदी (नोटबंदी) के फैसले में श्रमिकों का हित निहित है। भारतीय मजदूर संघ से जुड़े एक नेता राजेश राय ने कहा, ‘हम श्रमिकों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह उनके भले ही है और वे समझ भी रहे हैं। मुझे नहीं लगता है कि नोटबंदी के फैसले से भाजपा को राजनीतिक रूप से कोई नुकसान होगा।’ 

इस पूरे मामले में राजनीतिक लाभ किसे होगा, यह तो चुनाव में ही पता चलेगा लेकिन फिलवक्त न केवल श्रमिकों बल्कि जूट उद्योग पर आश्रित सभी वर्गों को आर्थिक राहत की सख्त जरूरत है ताकि जूट उद्योग की सेहत बरकरार रहे।
(तहलका मैगजीन, दिसंबर 2016)

No comments:

Powered by Blogger.